भारत में कृषि न केवल जीविकोपार्जन का साधन है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था की मुख्य रीढ़ भी है। दलहनी फसलों (Pulses) की बात करें तो चने (Chickpea/Gram) का स्थान सबसे ऊपर आता है। चना एक अत्यंत पौष्टिक, प्रोटीन से भरपूर और भारतीय खानपान का प्रमुख हिस्सा है। भोजन के साथ-साथ यह मिट्टी की उर्वरता (Soil Fertility) को बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, क्योंकि इसकी जड़ों में मौजूद ग्रंथियां वायुमंडलीय नाइट्रोजन को मिट्टी में स्थिर करती हैं।
चना कम लागत और कम पानी में किसानों को अधिक मुनाफा देने वाली एक प्रमुख रबी (Rabi) फसल है। हालांकि, पारंपरिक तरीकों से खेती करने पर अक्सर पैदावार सीमित रह जाती है। यदि सही वैज्ञानिक तकनीकों, उन्नत किस्मों और सटीक प्रबंधन का उपयोग किया जाए, तो चने का बंपर उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। इस विस्तृत गाइड में हम आपको चना की खेती करने का सही तरीका (Scientific Chickpea Cultivation Guide) विस्तार से बताएंगे। कृषि और बागवानी से जुड़ी ऐसी ही अन्य विस्तृत जानकारियों के लिए आप हमारी खेती-किसानी (Kheti Kisani) कैटेगरी के लेख भी पढ़ सकते हैं।
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1. चने की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु और तापमान
चने की फसल मुख्य रूप से शुष्क और ठंडी जलवायु की फसल है। यही कारण है कि भारत में इसे रबी के सीजन (सर्दियों) में उगाया जाता है। चने के सफल उत्पादन के लिए मौसम का सही होना अत्यंत आवश्यक है।
तापमान की आवश्यकता:
चने के बीजों के अंकुरण के लिए 20°C से 25°C तापमान सबसे उपयुक्त माना जाता है। पौधों की वृद्धि के समय 15°C से 20°C तथा फसल पकते समय 25°C से 30°C तापमान होना चाहिए। अत्यधिक ठंड या पाला (Frost) फसल को नुकसान पहुँचा सकता है, विशेषकर जब पौधे में फूल आ रहे हों।
वर्षा और नमी:
चने को बहुत अधिक पानी की आवश्यकता नहीं होती है। इसे 60 से 90 सेमी वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में बिना सिंचाई के (बारानी क्षेत्रों में) भी आसानी से उगाया जा सकता है। बुवाई के समय मिट्टी में पर्याप्त नमी होना आवश्यक है, लेकिन अत्यधिक जलजमाव इसकी जड़ों को पूरी तरह नष्ट कर सकता है।
2. उपयुक्त मिट्टी का चयन एवं खेत की तैयारी
चने की खेती लगभग सभी प्रकार की मिट्टियों में की जा सकती है, लेकिन सर्वोत्तम परिणाम प्राप्त करने के लिए सही मिट्टी का चयन और उसकी तैयारी आवश्यक है।
मिट्टी का चुनाव:
अच्छी जल निकासी वाली दोमट (Loam) या मटियार दोमट मिट्टी चने की खेती के लिए सबसे उत्तम मानी जाती है। इसके अलावा हल्की बलुई दोमट या काली मिट्टी में भी चने की अच्छी उपज मिलती है। मिट्टी का pH मान 6.0 से 7.5 के बीच होना चाहिए। अत्यधिक क्षारीय या अमलीय मिट्टी में चने का उत्पादन प्रभावित होता है।
खेत की तैयारी:
चना एक गहरी जड़ वाली फसल है, इसलिए खेत की पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल या हैरो से गहरी करें। इसके बाद 2 से 3 बार देशी हल या कल्टीवेटर से जुताई करके मिट्टी को भुरभुरा बना लें। जुताई के बाद पाटा (Plank) चलाकर खेत को समतल कर दें ताकि सिंचाई का पानी समान रूप से फैल सके। मिट्टी में जैविक तत्वों की मात्रा बढ़ाने के लिए अंतिम जुताई के समय सड़ी हुई गोबर की खाद अवश्य मिलाएं। घर पर ही गुणवत्तापूर्ण खाद बनाने के तरीके जानने के लिए देशी जैविक खाद बनाने का सही तरीका पढ़ें।
3. चने की उन्नत किस्में (High-Yielding Varieties)
अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए अपने क्षेत्र और जलवायु के अनुकूल उन्नत और रोग-प्रतिरोधी किस्मों के बीजों का चयन करना सबसे महत्वपूर्ण कदम है। चने को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा जाता है: देशी (Desi) और काबुली (Kabuli)।
प्रमुख देशी किस्में:
- जी एन जी – 1581 (गंगौर): यह किस्म उकटा (Wilt) रोग प्रतिरोधी है और 120-125 दिनों में पककर तैयार हो जाती है।
- जाकी 9218: दक्षिण और मध्य भारत के लिए एक बहुत ही लोकप्रिय किस्म है जो बंपर पैदावार देती है।
प्रमुख काबुली किस्में:
- पुसा 1053: काबुली चने की यह किस्म बड़े दानों वाली होती है और बाज़ार में इसका अच्छा मूल्य मिलता है।
- जी एन जी – 1958: यह किस्म भी उकटा रोग के प्रति प्रतिरोधी है।
क्षेत्रीय सिफारिशों और आधिकारिक बीज वितरण की जानकारी के लिए आप भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) की आधिकारिक वेबसाइट का संदर्भ भी ले सकते हैं।
4. बीज दर, बीज उपचार और बुवाई की विधि
सही समय पर और सही तकनीक से बुवाई करने से पौधों का विकास अच्छा होता है और बीमारियां कम लगती हैं।
बीज दर (Seed Rate):
- देशी चना: 60 से 75 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर।
- काबुली चना: 90 से 100 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर (क्योंकि इसके दाने बड़े और भारी होते हैं)।
बीज उपचार (Seed Treatment):
बुवाई से पहले बीजों का उपचार करना अत्यंत आवश्यक है ताकि फसल को फफूंद जनित रोगों (जैसे उकटा या जड़ सड़न) से बचाया जा सके। बीजों को ट्राईकोडर्मा (Trichoderma Viride) 5 ग्राम प्रति किग्रा बीज या ट्राइकोडर्मा और कार्बेन्डाजिम के मिश्रण से उपचारित करें। इसके बाद बीजों को राइजोबियम कल्चर (Rhizobium Culture) और PSB कल्चर से उपचारित करके छाया में सुखाएं।
बुवाई का समय और तरीका:
चने की बुवाई का सबसे उपयुक्त समय 15 अक्टूबर से 15 नवंबर (अक्टूबर के दूसरे पखवाड़े से नवंबर के प्रथम सप्ताह) तक होता है। बुवाई हमेशा कतारों (Lines) में सीड्रिल की मदद से करनी चाहिए। कतार से कतार की दूरी 30 से 45 सेमी और पौधे से पौधे की दूरी 10 सेमी रखनी चाहिए। बीज को मिट्टी में 7 से 10 सेमी गहरा बोना चाहिए, ताकि बीज को पर्याप्त नमी मिले और उकटा रोग का प्रकोप कम हो। दलहनी फसलों के बाद अन्य फसल चक्रों को समझने के लिए हमारी गाइड मूंग की खेती करने का तरीका भी देखें।
5. खाद एवं उर्वरक प्रबंधन (Fertilizer Management)
चना एक दलहनी फसल होने के कारण अपनी जड़ों की ग्रंथियों में नाइट्रोजन का स्थिरीकरण स्वयं करता है। इसलिए इसे बहुत अधिक रासायनिक नाइट्रोजन की आवश्यकता नहीं होती। अत्यधिक यूरिया या नाइट्रोजन देने से पौधों की वानस्पतिक वृद्धि बहुत अधिक हो जाती है, जिससे फलियाँ कम बनती हैं।
अनुशंसित मात्रा (प्रति हेक्टेयर):
- नाइट्रोजन (N): 20 किलोग्राम (शुरुआती विकास के लिए स्टार्टअप डोज)
- फास्फोरस (P): 40 से 50 किलोग्राम (जड़ों के विकास और फलियों के गठन के लिए आवश्यक)
- पोटाश (K): 20 किलोग्राम
- सल्फर (Sulfur): 20 किलोग्राम (दाना मजबूत और चमकदार बनाने हेतु)
खाद की यह पूरी मात्रा बुवाई के समय ही कूंड़ों में बीज से थोड़ी नीचे डाल देनी चाहिए। यदि आप बिना रसायनों के प्राकृतिक खेती करना चाहते हैं, तो ज़ीरो बजट नेचुरल फार्मिंग (ZBNF) का तरीका अपनाकर लागत कम कर सकते हैं।
6. सिंचाई और जल प्रबंधन
चने की फसल को बहुत कम पानी की आवश्यकता होती है। अत्यधिक सिंचाई से पौधे पीले पड़कर सूखने लगते हैं। सामान्यतः चने की फसल में 1 से 2 सिंचाइयों की ही आवश्यकता पड़ती है।
सिंचाई का सही समय:
- पहली सिंचाई: बुवाई के 30 से 45 दिनों बाद (शाखाएं निकलते समय या खुटाई के समय)।
- दूसरी सिंचाई: बुवाई के 70 से 80 दिनों बाद (जब फलियों में दाना भर रहा हो)।
विशेष सावधानी: जब पौधे में फूल आ रहे हों (Flowering Stage), तब कभी भी सिंचाई न करें। फूल आते समय पानी देने से फूल झड़ जाते हैं और फसल की पैदावार में भारी गिरावट आती है। जल संरक्षण तकनीकों और आधुनिक खेती के लिए हमारी स्मार्ट फार्मing गाइड पढ़ें।
7. खरपतवार, छंटाई (खुटाई) और कीट-रोग नियंत्रण
खरपतवार नियंत्रण और खुटाई (Nipping):
बुवाई के 25 से 30 दिनों बाद खेत में खरपतवार निकालने के लिए निराई-गुराई अवश्य करें। जब चने का पौधा 30-35 दिनों का हो जाए और उसकी ऊँचाई 15-20 सेमी हो, तो उसके ऊपरी शीर्ष (Top Shoots) को तोड़ देना चाहिए। इस प्रक्रिया को खुटाई (Nipping) कहते हैं। इससे पौधे की मुख्य शाखा रुकती है और नीचे से नई-नई शाखाएँ निकलती हैं, जिससे फलियों की संख्या और पैदावार में 20-25% की वृद्धि होती है।
प्रमुख रोग और कीट नियंत्रण:
- उकटा रोग (Wilt Disease): यह चने का सबसे विनाशकारी रोग है जिसमें पौधे अचानक सूखने लगते हैं। इससे बचाव के लिए बीजोपचार करें, फसल चक्र अपनाएं और प्रतिरोधी किस्मों का चयन करें।
- फली छेदक कीट (Pod Borer / Helicoverpa): यह सुंडी फलियों में छेद करके दाने खा जाती है। इसके जैविक नियंत्रण के लिए फेरोमोन ट्रैप (Pheromone Traps) लगाएं या नीम के तेल (Neem Oil) का छिड़काव करें। गंभीर प्रकोप होने पर उपयुक्त कीटनाशक का प्रयोग करें। कीटनाशक रहित तकनीकों के लिए कीटनाशक मुक्त खेती के उपाय पढ़ें।
8. फसल की कटाई, गहाई और पैदावार
चने की फसल किस्म और मौसम के आधार पर 110 से 130 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। जब पौधे की पत्तियाँ सूखकर पीली या भूरी होने लगें और फलियों में से दाना हिलाने पर खड़खड़ाने की आवाज आए, तो समझ जाएं कि फसल कटाई के लिए तैयार है।
कटाई और भंडारण:
हंसिया या दरांती से पौधों को ज़मीन के पास से काट लें। कटी हुई फसल को 2 से 3 दिनों तक धूप में अच्छी तरह सुखाएं। इसके बाद थ्रेशर या डंडों से पीटकर दाने अलग कर लें। भंडारण से पहले दानों को धूप में सुखाकर नमी की मात्रा 8 से 10% तक ले आएं। सुरक्षित अनाज रखने के वैज्ञानिक तरीकों के लिए अनाज भंडारण का सही तरीका अवश्य पढ़ें।
कुल पैदावार:
उन्नत वैज्ञानिक प्रबंधन द्वारा देशी चने से औसतन 20 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तथा काबुली चने से 18 से 22 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पैदावार प्राप्त की जा सकती है। चने की खेती के बाद आप खेत में अगली रबी या जायद फसलों जैसे सरसों की खेती या जौ की खेती करने का तरीका अपना सकते हैं। आप कृषि क्षेत्र की सरकारी योजनाओं की विस्तृत जानकारी के लिए कृषि एवं किसान कल्याण विभाग की साइट देख सकते हैं।
चना की खेती से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
1. चना की खेती किस महीने में की जाती है?
चने की बुवाई का सबसे उपयुक्त समय 15 अक्टूबर से 15 नवंबर (अक्टूबर के दूसरे पखवाड़े से नवंबर के प्रथम सप्ताह) के बीच होता है।
2. एक एकड़ खेत के लिए चने का कितना बीज लगता है?
देशी चने के लिए 25 से 30 किलोग्राम प्रति एकड़ और काबुली चने के लिए 35 से 40 किलोग्राम प्रति एकड़ बीज की आवश्यकता होती है।
3. चने के पौधों की खुटाई (Nipping) कब और क्यों करनी चाहिए?
बुवाई के 30 से 35 दिन बाद जब पौधे 15-20 सेमी के हो जाएं, तो उनकी ऊपरी पत्तियों को तोड़ देना चाहिए। इससे नई शाखाएं ज्यादा निकलती हैं और फलियों की संख्या तथा पैदावार बढ़ती है।
4. चने में उकटा रोग (Wilt) से बचाव कैसे करें?
उकटा रोग से बचने के लिए बीज को ट्राइकोडर्मा (5 ग्राम/किग्रा) से उपचारित करके बोएं, रोग-प्रतिरोधी किस्में (जैसे जीएनजी 1581) चुनें और गहराई पर (7-10 सेमी) बुवाई करें।
5. चने की फसल में कितनी सिंचाई की आवश्यकता होती है?
चने की फसल को बहुत कम पानी चाहिए। सामान्यतः 1 से 2 सिंचाइयों की जरूरत होती है—पहली बुवाई के 30-45 दिन बाद (शाखाएं बनते समय) और दूसरी फलियों में दाना बनते समय।
6. क्या चने में फूल आते समय पानी देना चाहिए?
नहीं, चने में जब फूल आ रहे हों तो कभी भी पानी नहीं देना चाहिए। फूल खिलने के समय सिंचाई करने से फूल झड़ जाते हैं और उत्पादन घट जाता है।
7. फली छेदक सुंडी (Pod Borer) के जैविक नियंत्रण के लिए क्या उपाय करें?
फली छेदक कीट के जैविक नियंत्रण के लिए खेत में प्रति एकड़ 5-6 फेरोमोन ट्रैप लगाएं और 5% नीम के तेल (Neem Seed Kernel Extract) का छिड़काव करें।
8. चना पककर तैयार होने में कितना समय लेता है?
चना किस्म और जलवायु के आधार पर लगभग 110 से 130 दिनों में पककर पूरी तरह तैयार हो जाता है।
9. प्रति हेक्टेयर चने की कितनी पैदावार प्राप्त की जा सकती है?
उन्नत तकनीकों और सही देखभाल से देशी चने की 20 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तथा काबुली चने की 18 से 22 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पैदावार मिल सकती है।
10. क्या चने के बाद यूरिया देना जरूरी है?
चने की फसल मिट्टी में प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन स्थिर करती है। इसलिए चने के बाद बोई जाने वाली फसल में यूरिया और रासायनिक खादों की आवश्यकता काफी कम हो जाती है।