आलू की खेती करने का सही तरीका

आलू की खेती करने का सही तरीका के बारे में जानते हैं

वैसे तो आलू भारत की सबसे महत्वफपूर्ण फसल है. दक्षिणी भारत में तमिलनाडु एवं केरल को छोडकर आलू सारे देश में उगाया जाता है. आलू का इतिहास भारत में  लगभग 7000 साल का है

Table of Contents

जलवायु (Climate)

आलू की खेती के लिए ठंढ मौसम उपयुक्त होता है वैसे  भारत के विभिन्न भागों में उचित जलवायु की उपलब्धता के अनुसार किसी न किसी भाग में सारे साल आलू की खेती कि जाती बढ़वार के समय आलू को मध्यिम शीत की आवश्यवकता होती है. मैदानी क्षेत्रो  में बहुधा शीतकाल (रबी) में आलू की खेती प्रचलित है. आलू की वृद्धि एवं विकास के लिए न्यूनतम  ताप 15- 25 डिग्री सेल्सियस के मध्य होना चाहिए.

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इसके अंकुरण के लिए लगभग 25 डिग्री सेल्सियस संवर्धन के लिए 20 डिग्री सेल्सियस और कन्द विकास के लिए 17 से 19 डिग्री सेल्सियस तापक्रम की आवश्यकता होती है, उच्चतर तापक्रम (30 डिग्री सेल्सियस) होने पर आलू  विकास की प्रक्रिया प्रभावित होती है अक्टूबर से मार्च तक,  लम्बी रात्रि तथा चमकीले छोटे दिन आलू बनने और बढ़ने के लिए अच्छे होते है। बदली भरे दिन, वर्षा तथा उच्च आर्द्रता का मौसम आलू की फसल में फफूँद व बैक्टीरिया जनित रोगों को फैलाने के लिए अनुकूल दशायें हैं.

भूमि (Land)

आलू की खेती के लिए सबसे जरुरी! है की आलू को क्षारीय मृदा के !अलावा सभी प्रकार के मृदाओ! में उगाया जा सकता है परन्तु !जीवांश युक्त रेतीली दोमट! या सिल्टी दोमट भूमि !आलू की खेती के लिए सर्वोत्तम है !भूमि में उचित जल निकास का प्रबंध! अति आवश्यक है! मिटटी का P H! मान 5.2 से 6.5 अत्यंत उपयुक्त! पाया गया है – जैसे जैसे यह P H !मान ऊपर बढ़ता जाता है दशाएं !अच्छी उपज के लिए प्रतिकूल हो जाती है.!

आलूके कंद मिटटी के अन्दर! तैयार होते है, अत मिटटी का भली! भांति भुर भूरा होना नितांत आवश्यक! है पहली जुताई मिटटी पलटने! वाले हल से करे दूसरी और !तीसरी जुताई देसी हल या हीरो से करनी! चाहिए यदि खेती में धेले !हो तो पाटा चलाकर मिटटी को भुरभुरा! बना लेना चाहिए बुवाई के समय! भूमि में पर्याप्त नमी का होना आवश्यक !है यदि खेत में नमी कि कमी हो तो !खेत में पलेवा करके जुताई! करनी चाहिए.

आलू की किस्में (Potato Varieties)

विदेशी किस्में

अपटुडेट, क्रेग्स डिफैंस, प्रेसिडेंट आदि .

केन्द्रीय आलू अनुसन्धान शिमला द्वारा विकसित किस्में  (Varieties developed by Central Potato Research Shimla)

1) कुफरी चन्द्र मुखी  

80-90 दिन में तैयार, 200-250 कुंतल उपज

2) कुफरी अलंकार

70 दिन में तैयार हो जाती है यह किस्म पछेती अंगमारी रोग के लिए कुछ हद तक प्रतिरोधी है यह प्रति हेक्टेयर 200-250 क्विंटल उपज देती है.

3) कुफरी बहार 3792 E

90-110 दिन में लम्बे दिन वाली दशा में 100-135 दिन में तैयार

4) कुफरी नवताल G 2524

75-85 दिन में तैयार, 200-250  कुंतल प्रति हेक्टेयर उपज है

5) कुफरी ज्योति

80 -120 दिन तैयार 150-250 कुंतल प्रति हेक्टेयर उपज है

6) कुफरी शीत मान

100-130 दिन में तैयार 250 कुंतल प्रति हेक्टेयर उपज है

7) कुफरी बादशाह

100-120 दिन में तैयार 250-275 कुंतल प्रति हेक्टेयर उपज है

8) कुफरी सिंदूरी

120 से 140 दिन में तैयार 300-400 कुंतल प्रति हेक्टेयर उपज है

9)  कुफरी देवा

120-125 दिन में तैयार 300-400 कुंतल प्रति हेक्टेयर उपज है

10) कुफरी लालिमा

यह शीघ्र तैयार होने वाली किस्म है जो 90-100 दिन में तैयार हो जाती है इसके कंद गोल आँखे कुछ गहरी और छिलका गुलाबी रंग का होता है

11) कुफरी लवकर

100-120 दिन में तैयार 300-400 कुंतल प्रति हेक्टेयर उपज है

12) कुफरी स्वर्ण

110 में दिन में तैयार  उपज 300 कुंतल प्रति हेक्टेयर उपज है

आलू की संकर किस्में (Hybrid varieties of potatoes)

कुफरी जवाहर JH 222

90-110 दिन में तैयार  खेतो में अगेता झुलसा और फोम रोग कि यह प्रति रोधी किस्म है यह 250-300 कुंतल प्रति हेक्टेयर उपज है

E 4,486

135 दिन में तैयार 250-300 क्विंटल उपज, हरियांणा, उत्तर प्रदेश, बिहार पश्चिम बंगाल गुजरात और मध्य प्रदेश में उगाने के लिए उपयोगी

JF 5106

उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रो में उगाने के लिए उपयोगी .75 दिनों की फ़सल, उपज 23-28 टन  प्रति हेक्टेयर उपज है

कुफरी संतुलज J 5857 I

संकर किस्म सिन्धु गंगा मैदानों और पठारी क्षेत्रो में उगाने के लिए, 75 दिनों की फ़सल उपज 23-28 टन प्रति हेक्टेयर उपज है

कुफरी अशोक P 376 J

75 दिनों मेकी फ़सल उपज 23-28 टन प्रति हेक्टेयर उपज है

JEX -166 C

अवधि 90 दिन में तैयार होने वाली किस्म है 30 टन प्रति हेक्टेयर उपज है

आलू की नवीनतम किस्में   (latest varieties of potatoes)

कुफरी चिप्सोना -1, कुफरी चिप्सोना -2, कुफरी गिरिराज, कुफरी आनंद

आलू के बीज का चुनाव (Potato’s Seed selection)

आलू के बीज का आकार और उसकी उपज से लाभ का आपस मे गहरा सम्बंध है. बडे माप के बीजों से उपज तो अधिक होती है परन्तु बीज की कीमत अधिक होने से पर्याप्त लाभ नही होता. बहुत छोटे माप का बीज सस्ताक होगा परन्तु  रोगाणुयुक्ता आलू पैदा होने का खतरा बढ जाता है. प्राय: देखा गया है कि रोगयुक्तह फसल में छोटै माप के बीजो का अनुपात अधिक होता है. इसलिए अच्छेक लाभ के लिए 3 से.मी. से 3.5 से.मी.आकार या 30-40 ग्राम भार के आलू को ही बीज के रूप में बोना चाहिए.

बुवाई का समय एवं बीज की मात्रा (Time of sowing and quantity of seeds)

उत्तर भारत में, जहॉ पाला पडना आम बात है, आलू को बढने के लिए कम समय मिलता है। अगेती बुआई से बढवार के लिए लम्बा समय तो मिल जाता है परन्तुप उपज अधिक नही होती क्योंकि ऐसी अगेती फसल में बढवार व कन्दब का बनना प्रतिकूल तापमान मे होता है साथ ही बीजों के अपूर्ण अंकुरण व सडन का खतरा भी बना रहता है।

अत: उत्तर भारत मे आलू की बुवाई इस प्रकार करें कि आलू दिसम्बर के अंत तक पूरा बन जाऐ। उत्तर-पश्चिमी भागों मे आलू की बुवाई का उपयुक्त समय अक्तू्बर माह का पहला पखवाडा है। पूर्वी भारत में आलू अक्तूबर के मध्य‍ से जनवरी तक बोया जाती है।  इसके लिए 25 से 30 क्विंटल बीज प्रति हैक्टेयर पर्याप्त होता है।

बुवाई की विधि (Method of sowing)

 पौधों में कम फासला रखने से रोशनी,पानी और पोषक तत्वों के लिए उनमें होड बढ जाती है फलस्वपरूप छोटे माप के आलू पैदा होते हैं। अधिक फासला रखने से प्रति हैक्टे,यर में पौधो की संख्या  कम हो जाती है जिससे आलू का मान तो बढ जाता है परन्तु उपज घट जाती है। इसलिए कतारों और पौधो की दूरी में ऐसा संतुलन बनाना होता है कि न उपज कम हो और न आलू की माप कम हो। उचित माप के बीज के लिए पंक्तियों मे 50 से.मी. का अन्तलर व पौधों में 20 से 25 से.मी. की दूरी रखनी चाहिए.

बीज उपचार (Seed treatment)

  • ओगरा, दीमक, फंफूद और जमीन, जनित बीमारी से बचाव के लिए बीज उपचारित करने का तरीका.
  • 5 लीटर देसी गाय का मट्ठा लेकर 15 ग्राम बराबर हींग लेकर अच्छी तरह से बारीक़ पीसकर घोल बनाकर उसमे बीज को उपचारित करे घंटे सुखाने पर बुवाई करे .
  • 5 देसी गाय के गोमूत्र में बीज को उपचारित 2-3 घंटे सूखने के बाद बुवाई करे.

खाद (Fertilizers)

  • गोबर की सड़ी खाद 50-60 टन20 किलो ग्राम नीम की खली 20 किलो ग्राम अरंडी की खली इन सब खादों को अच्छी तरह से मिलाकर प्रति एकड़ भूमि में समान मात्रा में छिड़काव कर जुताई कर खेत तैयार कर बुवाई करे ,
  • जब फसल 25 – 30 दिन की हो जाए तब उसमे 10ली. गौमूत्र में नीम का काड़ा मिलाकर अच्छी प्रकार से मिश्रण तैयार कर फसल में तर-बतर कर छिड़काव करें और हर 15-20 दिन के अंतर से दूसरा व तीसरा छिड़काव करें.
  • रासायनिक खाद की दशा में खाद की मात्रा प्रति हेक्टेअर मिट्टी परीक्षण के आधार पर दे.
  • गोबर की सड़ी खाद : 50-60 टन
  • नाइट्रोजन : 100-120 कि०ग्रा० प्रति हेक्टेअर
  • फॉसफोरस : 45-50 कि०ग्रा० प्रति हेक्टेअर
  • गोबर तथा फ़ॉस्फ़रस खादों की मात्रा को खेत की तैयारी में रोपाई से पहले मिट्टी में अच्छी प्रकार मिला दें.
  • नाइट्रोजन की खाद को 2 या 3 भागों में बांटकर रोपाई के क्रमशः 25 ,45 तथा 60 दिन बाद प्रयोग कर सकते हैं.
  • नाइट्रोजन की खाद दूसरी बार लगाने के बाद पौधों पर परत की मिट्टी चढाना लाभदायक रहता है.

सिंचाई (Irrigation)

आलू की सफल खेती के लिए सिंचाई का महत्व पूर्ण योगदान है मैदानी क्षेत्रो में पानी कि उपलब्धता होने पर ही खेती कि जा सकती है परन्तु पहाड़ी क्षेत्रो में आलू कि खेती वर्षा पर निर्भर करती है इसकी खेती में पानी कि कमी किसी भी अवधी में होने से आलू का बढ़वार, विकास और कंद के निर्माण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है ऐसी जगह जहाँ पानी ठहरता हो वंहा इससे हानी होती है

आलू कि पहली सिंचाई अंकुरण के उपरांत करनी चाहिए इसके बाद कि 10-12 दिन के अंतराल पर करे प्रत्येक बार हलकी सिंचाई करनी चाहिए इस बात का ध्यान सिंचाइयाँ रहे खूंड तिन चौथाई से अधिक न डूबने पाए कंद निर्माण के समय पानी कि कमी किसी भी हालत में नहीं होनी चाहिए

इसकी खेती 500 लगभग मी.ली. पानी कि आवश्यकता होती है आलू कि खुदाई करने के 10 दिन पूर्ब सिंचाई बंद कर देनी चाहिए इससे आलू के कंदों का छिलका कठोर हो जाता है जिससे खुदाई करते समय छिलका नहीं छिलता और कंदों के भण्डारण क्षमता में बृद्धि हो जाती है .

खरपतवार (Weed)

आलू कि खेती में खर पतवारो कि समस्या मिटटी चढ़ाने से पूर्ब अधिक होती है यह समस्या निराई गुड़ाई और मिटटी चढ़ाने से काफी कम हो जाती है फिर भी किन्ही किन्ही स्थानों आर खरपतवार की बढ़वार इतनी अधिक हो जाती है कि वे आलू के पौधे निकलने से पहले ही उन्हें ढक लेते है जिसके कारण आलू के फसल को काफी क्षति होती है उन्हें निकाई गुड़ाई कर निकाल देना चाहिए .

कीट (Insects)

चैपा 

यह गहरे हरे या काले रंग के होते है प्रौढ़ अवस्था में यह दो प्रकार के होते है पंखदार और पंख हिन् इसके अवयस्क और प्रौढ़ दोनों ही पत्तियों और शाखाओं का रस चूसते है अधिक प्रकोप होने पर पत्तियां निचे की ओर मुड जाती है और पीली पड़कर सूख जाती है इसकी पंखदार जाती विषाणु फ़ैलाने में सहायता करती है .

उपचार

देसी गाय का 5 लीटर मट्ठा लेकर उसमे 5 किलो नीम कि पत्ती या 2 किलोग्राम नीम कि खली या 2 किलोग्राम  नीम की पत्त्ती एक बड़े मटके में 40-50 दिन भरकर तक सडा कर – सड़ने के बाद उस मिश्रण में से 5 लीटर मात्रा को 200 लीटर पानी में डालकर अच्छी तरह मिलाकर तर बतर कर प्रति एकड़ छिड़काव करे.

कुतरा 

इस कीट कि सुंडिया आलू के पौधों और शाखाओं और उगते हुए कंदों को काट देती है बाद कि अवस्था में इसकी सुंडी आलुओं में छेद कर देती है जिससे कंदों का बाजार भाव कम हो जाता है यह कीट रात में फसल को क्षति पहुंचाती है.

उपचार 

10 लीटर देसी गाय का गोमूत्र में 2 किलो अकौआ की पत्ती 2किलो नीम की पत्ती 2किलो बेसरम की पत्ती मिलाकर 10-15 दिन तक सड़ाकर इस मूत्र को आधा शेष बचने तक उबालकर फिर इसके लीटर 1 मिश्रण को 200 लीटर पानी में मिलाकर तर बतर कर पम्प द्वारा प्रति एकड़ छिड़काव करे.

वाइट ग्रब

इसे कुरमुला कि संज्ञा भी दी जाती है जो सफ़ेद या सलेटी रंग कि होती है इसका शरीर मुडा हुआ और सर भूरे रंग का होता है यह जमीन के अन्दर रहकर पौधों कि जड़ो को क्षति पहुंचता है इसके अतिरिक्त आलू में छिद्र कर देती है जिसके कारण आलू का बाजार भाव कम हो जाता है.

उपचार 

10 लीटर देसी गाय का गोमूत्र में 2 किलो अकौआ कि पत्ती मिलाकर 10-15 दिन तक सड़ाकर इस मूत्र को आधा शेष बचने तक उबालकर फिर इसके लीटर 1 मिश्रण को 200 लीटर पानी में मिलाकर तर बतर कर पम्प द्वारा प्रति एकड़ छिड़काव करे .

एपिलेकना 

यह छोटा , पीलापन लिए हुए भूरे रंग का कीट है इसक पीठ का भाग उठा हुआ होता है जिस पर काफी बिंदिया पाई जाती है अवयस्क और प्रौढ़ कीट दोनों ही क्षति पहुंचे है पौधों कि पत्तियों को कीट इसके बच्चे धीरे धीरे खुरच कर खा जाते है और पत्तियां सूख जाती है.

उपचार 

10 लीटर देसी गाय का गोमूत्र में 2 किलो अकौआ की पत्ती 2 किलो नीम की पत्ती 2 किलो बेसरम की पत्ती मिलाकर 10-15 दिन तक सड़ाकर इस मूत्र को आधा शेष बचने तक उबालकर फिर इसके लीटर 1 मिश्रण को 200 लीटर पानी में मिलाकर तर बतर कर पम्प द्वारा प्रति एकड़ छिड़काव करे.

ये भी पढ़ें एक अच्छे माता पिता कैसे बनें ? अच्छे माता पिता बनने का सही तरीका

रोग (Disease)

अगेती अंगमारी

यह रोग आल्तेरनेरिया सोलेनाई नामक फफूंदी के कारण लगता है उत्तरी भारत में इस रोग का आक्रमण शरद ऋतु के फसल पर नवम्बर में और बसंत कालीन फसल में फरवरी में होता है यह रोग कंद निर्माण से पहले ही लग सकता है निचे वाली पत्तियों पर सबसे पहले प्रकोप होता है जंहा से रोग बाद में ऊपर कि ओर बढ़ता है पत्तियों पर छोट छोटे गोल अंडाकार या कोणीय धब्बे बन जाते है जो भूरे रंग के होते है ये धब्बे सूखे एवं चटकने वाले होते है बाद में धब्बे के आकार में बृद्धि हो जाती है जो पूरी पत्ती को ढक लेती है रोगी पौधा मर जाता है.

उपचार 

10 लीटर देसी गाय का गोमूत्र में 2 किलो अकौआ की पत्ती 2किलो नीम की पत्ती 2किलो बेसरम की पत्ती मिलाकर 10-15 दिन तक सड़ाकर इस मूत्र को आधा शेष बचने तक उबालकर फिर इसके लीटर 1 मिश्रण को 200 लीटर पानी में मिलाकर तर बतर कर पम्प द्वारा प्रति एकड़ छिड़काव करे

पछेती अंगमारी 

यह रोग फाइटो पथोरा इन्फैस्तैन्स नामक फफूंदी के द्वारा होता है इस रोग में पत्तियों कि शिराओं , तानो डंठलो पर छोटे भूरे रंग के धब्बे उभर आते है जो बाद में काले पड़ जाते है और पौधे के भूरे भाग गल सड़ जाते है रोकथाम में देरी होने पर आलू के कंद भूरे बैगनी रंग में परवर्तित होने के उपरांत गलने शुरू हो जाते है .

उपचार 

10 लीटर देसी गाय का गोमूत्र में 2 किलो अकौआ की पत्ती 2किलो नीम की पत्ती 2किलो बेसरम की पत्ती मिलाकर 10-15 दिन तक सड़ाकर इस मूत्र को आधा शेष बचने तक उबालकर फिर इसके लीटर 1 मिश्रण को 200 लीटर पानी में मिलाकर तर बतर कर पम्प द्वारा प्रति एकड़ छिड़काव करे
500 ग्राम लहसुन और 500 ग्राम तीखी चटपटी हरी मिर्चलेकर बारीक़ पीसकर 200 लीटर पानी में घोलकर थोडा सा शैम्पू झाग के लिए मिलाकर तर बतर कर अच्छी तरह छिड़काव प्रति एकड़ करे.

काली रुसी ब्लैक स्कर्फ

यह रोग राइजोक्टोनिया सोलेनाई !नामक फफूंदी के कारण होता है! इस रोग का आक्रमण मैदानी या पर्वतीय !क्षेत्र में होता है रोगी कंदों! प़र चाकलेटी रंग के !उठे हुए धब्बो का निर्माण हो जाता है! जो धोने से साफ नहीं होते है !है इस फफूंदी का प्रकोप बुवाई !के बाद आरम्भ होता है जिससे कंद मर !जाते है और पौधे दूर दूर दिखाई पड़ते है.

उपचार 

10 लीटर देसी गाय का गोमूत्र! में 2 किलो अकौआ की !पत्ती 2किलो नीम की !पत्ती 2किलो बेसरम की पत्ती मिलाकर !10-15 दिन तक सड़ाकर इस मूत्र !को आधा शेष बचने तक उबालकर !फिर इसके लीटर 1 मिश्रण को 200 लीटर पानी! में मिलाकर तर बतर कर पम्प द्वारा प्रति एकड़ !छिड़काव करे.

खुदाई 

खेत में खुदाई के समय कटे !और सड़े आलू के कंदों को अलग कर !देना चाहिए, खुदाई छंटाई और बोरियों में !भरते समय और बाजार भेजने के समय इस !बात का ध्यान रखना चाहिये कि !आलू काछिलका न उतरे साथ ही !उन्हें किसी प्रकार का क्षति !नहीं होनी चाहिए तो बाजार भाव !अच्छा रहता है.

आलू का उत्पादन (Potato Production)

आलू कि उपज उसकी किस्म भूमि कि उर्बरा शक्ति और फसल कि देख भाल पर निर्भर करती है मैदानी क्षेत्रो में एक हेक्टेयर अगेती,मध्य मौसमी किस्मो कि 200-250 क्विंटल और पछेती किस्मो कि 300-400 कुंतल तक उपज मिलती है पर्वतीय घाटियों में 150 – 200 कुंतल और ऊँचे पहाड़ो पर 200 क्विंटल तक उपज मिल जाती है.

आलूका भण्डारण (Potato Storage)

आलू शीघ्र ख़राब होने वाली फसल है. अत: इसके लिए अच्छे भण्डारण कि सुबिधा का होना नितांत आवश्यक है पर्वतीय क्षेत्रो में कम तापमान होने के कारण वंहा भण्डारण कि कोई बिशेष समस्या नहीं होती है भण्डारण कि बिशेष समस्या मैदानी भागो में होती है मैदानी क्षेत्रो में आलू को ख़राब होने से बचाने के लिए शीत भंडार गृहों में रखने कि आवश्यकता होती है इन शीत भंडार गृहों में तापमान 1 से 2.5 डिग्री सेल्सियस और आपेक्षिक आद्रता 90-95% होती है .

उम्मीद है आपको आलू की खेती करने का सही तरीका के बारे काफी अच्छी जानकारी मिल गई होगी, कृपया सुझाव के लिए कमेंट करें

भारत में पोषक तत्वों से भरपूर मोटे अनाजों (Millets) की मांग दिन-प्रतिदिन तेजी से बढ़ रही है। ‘सुपरफूड’ के रूप में पहचाना जाने वाला बाजरा (Pearl Millet) भारत की प्रमुख खाद्यान्न और चारा फसलों में से एक है। इसकी खेती मुख्य रूप से राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और दक्षिण भारत के शुष्क व अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर की जाती है। बाजरा कम पानी, उच्च तापमान और कम उपजाऊ मिट्टी में भी बंपर पैदावार देने की क्षमता रखता है। यही कारण है कि बदलते जलवायु परिवर्तन के दौर में किसानों के लिए बाजरे की खेती (Bajra Farming) एक सुरक्षित और मुनाफा देने वाला सौदा साबित हो रही है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बाजरे का वनस्पति नाम Pennisetum glaucum है। इसमें प्रोटीन, फाइबर, आयरन, कैल्शियम और एंटीऑक्सीडेंट्स भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं, जो शरीर में जीवाणुरोधी गुणों का संचार करते हैं और पाचन तंत्र को मजबूत बनाते हैं। यदि आप भी कम लागत में अधिक लाभ कमाना चाहते हैं, तो यह विस्तृत गाइड आपके लिए बेहद उपयोगी है। इस लेख में हम बाजरे की उन्नत खेती के तरीके, मिट्टी के चयन, खेत की तैयारी, उन्नत किस्मों, सिंचाई, कीट नियंत्रण और कटाई पर गहराई से चर्चा करेंगे। कृषि एवं बागवानी से संबंधित अन्य महत्वपूर्ण जानकारियों के लिए हमारे Kheti Kisani Category को जरूर पढ़ें।


1. बाजरे की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु और मिट्टी (Climate & Soil Requirement)

बाजरा मुख्य रूप से गर्म और शुष्क जलवायु की फसल है। इसके पौधों के बेहतर विकास और बीजों के अंकुरण के लिए 25°C से 35°C का तापमान सबसे आदर्श माना जाता है। बाजरा न्यूनतम 40 से 50 सेंटीमीटर वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में भी आसानी से उगाया जा सकता है। अत्यधिक जलभराव वाली स्थिति इस फसल के लिए नुकसानदायक होती है।

मिट्टी का चयन: बाजरे की खेती लगभग सभी प्रकार की भूमियों में की जा सकती है, लेकिन हल्की रेतीली दोमट, बलुई दोमट और अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी इसके लिए सबसे उत्तम मानी जाती है। भूमि का pH मान 6.0 से 7.5 के बीच होना चाहिए। यदि आपकी जमीन में नमी धारण क्षमता कम है, तब भी बाजरा उसमें सफलतापूर्वक पनप सकता है।

2. खेत की तैयारी और खाद प्रबंधन (Field Preparation & Soil Fertility)

बाजरे के बीज आकार में छोटे होते हैं, इसलिए खेत की मिट्टी का भुरभुरा होना बेहद आवश्यक है। सबसे पहले मिट्टी पलटने वाले हल या ट्रैक्टर चालित कल्टीवेटर से 1 से 2 गहरी जुताई करें। इसके बाद 2 बार हल्की जुताई करके पाटा (Plank) चलाएं ताकि खेत समतल हो जाए।

उर्वरक एवं पोषण प्रबंधन:

  • देसी खाद: अंतिम जुताई के समय 8 से 10 टन प्रति एकड़ अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद मिट्टी में मिलाएं। कंपोस्ट खाद तैयार करने की सही विधि जानने के लिए पढ़ें Desi Khad Kaise Banaye.
  • रासायनिक उर्वरक: सिंचित क्षेत्रों के लिए प्रति एकड़ 30-35 किग्रा नाइट्रोजन, 15-20 किग्रा फास्फोरस और 15 किग्रा पोटाश की आवश्यकता होती है। असिंचित क्षेत्रों में नाइट्रोजन की मात्रा आधी कर देनी चाहिए।

जैविक खेती और कीटनाशक मुक्त सब्जियां उगाने के आधुनिक तरीकों के लिए देखें Pesticide Free Vegetable Farming Guide.

3. बुवाई का सही समय, बीज दर और बीजोपचार (Sowing Time & Seed Treatment)

बाजरे की खेती खरीफ (बरसात), जायद (गर्मी) और कुछ क्षेत्रों में रबी सीजन में भी की जाती है:

  • खरीफ (मुख्य सीजन): मानसून आने के साथ ही जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई के मध्य तक बुवाई करना सबसे उत्तम होता है।
  • जायद (गर्मी का सीजन): सिंचाई सुविधाओं वाले क्षेत्रों में फरवरी के अंतिम सप्ताह से मार्च तक बुवाई की जा सकती है।

बीज दर एवं बीजोपचार: प्रति एकड़ लगभग 1.5 से 2 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है। बुवाई से पहले बीजों को अरगट (Ergot) और डाउनी फफूंद जैसे रोगों से बचाने के लिए 20% नमक के घोल से धोकर साफ पानी से धोएं। इसके बाद थाइरम (Thiram) या कारबेन्डाजिम (Carbendazim) 2 ग्राम प्रति किग्रा बीज की दर से बीजोपचार अवश्य करें।

4. बाजरे की उन्नत एवं हाइब्रिड किस्मों का चयन (Top Bajra Varieties)

उच्च उत्पादन और रोगों से बचाव के लिए क्षेत्र के अनुसार सही किस्मों का चुनाव करना चाहिए। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान और राज्यों के कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा विकसित प्रमुख किस्में निम्नलिखित हैं:

प्रमुख हाइब्रिड एवं उन्नत किस्म:

  • HHB 67 Improved: यह किस्म मात्र 60-65 दिनों में पककर तैयार हो जाती है और कम बारिश वाले क्षेत्रों के लिए वरदान है।
  • RHB 177 & RHB 121: राजस्थान और शुष्क क्षेत्रों के लिए अत्यधिक उपयुक्त, जो सूखा सहन करने में सक्षम हैं।
  • Pusa Composite 415 & HHB 226: यह दाने और चारे दोनों के उद्देश्य से बेहतरीन उत्पादन देती है।
  • Pusa 1201: रोग प्रतिरोधी क्षमता से भरपूर और बंपर पैदावार देने वाली लोकप्रिय किस्म।

अन्य अनाज और व्यावसायिक फसलों की वैज्ञानिक विधि समझने के लिए पढ़ें Mungfali Ki Kheti Kaise Kare. औषधीय फसलों की खेती के लिए देखें Lemongrass Ki Kheti Kaise Kare.

5. बुवाई की वैज्ञानिक विधि और पौध रोपाई (Sowing Method & Transplanting)

बाजरे की बुवाई मुख्य रूप से दो तरीकों से की जाती है: सीधी सीड ड्रिल द्वारा बुवाई और पौध रोपाई (Transplanting Method)।

सीधी बुवाई: पंक्तियों में बुवाई करते समय कतार से कतार की दूरी 45 सेमी और पौधे से पौधे की दूरी 12 से 15 सेमी रखनी चाहिए। बीजों को मिट्टी में 2 से 3 सेमी से अधिक गहरा न बोएं।

रोपाई विधि (Transplanting): यदि मानसून में देरी हो जाए या खेत देर से खाली हो, तो नर्सरी में 15-20 दिन के पौधे तैयार करके खेत में रोपाई की जाती है। रोपाई हमेशा सुबह या शाम के समय करें और रोपाई के तुरंत बाद हल्की सिंचाई करें। इस विधि से प्रति पौधा दानों का गुच्छा भारी बनता है और पैदावार 20-25% तक बढ़ जाती है।

सरकारी नियमों और लाइसेंस प्राप्त फसलों की जानकारी के लिए पढ़ें Afeem Ki Kheti Kaise Kare.

6. सिंचाई और खरपतवार नियंत्रण (Irrigation & Weed Control)

खरीफ सीजन की फसल पूरी तरह वर्षा पर निर्भर होती है, इसलिए अतिरिक्त सिंचाई की आवश्यकता आमतौर पर नहीं पड़ती। हालांकि, यदि बारिश न हो तो दो मुख्य संवेदनशील अवस्थाओं पर सिंचाई अवश्य करनी चाहिए:

  1. सिट्टे (Heading Stage) निकलते समय
  2. दानों में दूध भरते समय (Grains Filling Stage)

खरपतवार प्रबंधन: बुवाई के 15-20 दिन बाद पहली निराई-गुड़ाई करें। घने पौधों को निकालकर (Thinning) पौधों के बीच उचित दूरी बनाएं। रासायनिक नियंत्रण के लिए बुवाई के तुरंत बाद एट्राजिन (Atrazine) 50% WP का छिड़काव करें।

उन्नत कृषि तकनीकों और सरकारी योजनाओं के लिए Ministry of Agriculture & Farmers Welfare की आधिकारिक वेबसाइट पर विजिट करें।

7. कीट एवं रोग प्रबंधन (Pest & Disease Management)

बाजरे की फसल में कुछ प्रमुख बीमारियों और कीटों का प्रकोप हो सकता है, जिनकी सही समय पर पहचान और उपचार जरूरी है:

  • अरगट (Ergot Disease): इसमें सिट्टों से चिपचिपा गोंद जैसा पदार्थ निकलता है जो बाद में काला पड़ जाता है। बचाव के लिए बीजोपचार करें और लक्षण दिखते ही मैनकोजेब (Mancozeb) का छिड़काव करें।
  • ग्रीन इयर / जोगिया रोग (Downy Mildew): पत्तियों पर पीली धारियां बनती हैं और सिट्टे पत्तियों जैसी संरचना में बदल जाते हैं। मेटलैक्सिल (Metalaxyl) का छिड़काव करें।
  • दीमक और तना छेदक (Stem Borer): इसके बचाव के लिए खेत में नीम की खली का प्रयोग करें या फिप्रोनिल (Fipronil) का छिड़काव करें।

फसलों की कटाई के बाद उपज की सुरक्षा और सुरक्षित भंडारण का सही तरीका जानने के लिए पढ़ें Anaj Bhandaran Karne Ka Sahi Tarika. बागवानी एवं अन्य सब्जियों की आधुनिक तकनीक हेतु Tamatar Ki Kheti Karne Ka Sahi Tarika भी देखें।

8. कटाई, गहाई और उपज का भंडारण (Harvesting & Storage)

जब बाजरे की पत्तियां और सिट्टे हल्के पीले या भूरे पड़ जाएं तथा दाने कड़े हो जाएं, तब फसल की कटाई कर लेनी चाहिए। कटाई के बाद सिट्टों को अलग करके धूप में अच्छी तरह 3-4 दिनों तक सुखाएं। इसके बाद थ्रेशर या हाथों से दाने अलग (Threshing) कर लें।

दानों में नमी का स्तर 10-12% से अधिक नहीं होना चाहिए। अच्छी तरह सुखाए गए दानों को साफ बोरियों में भरकर कीट-रहित स्थान पर भंडारित करें। वैज्ञानिक और हाइब्रिड तकनीकों से खेती करने पर प्रति एकड़ 12 से 18 क्विंटल दाना और 30 से 40 क्विंटल सूखा चारा प्राप्त किया जा सकता है।

मोटे अनाजों के वैश्विक मानकों और पोषण संबंधी रिपोर्ट के लिए Food and Agriculture Organization (FAO) की रिपोर्ट देखें।

9. बाजरे की खेती से जुड़े 10 महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

Q1. एक एकड़ में बाजरे का कितना बीज लगता है?

Ans: सीधी बुवाई के लिए एक एकड़ में लगभग 1.5 से 2 किलोग्राम बाजरे के बीज की आवश्यकता होती है।

Q2. बाजरे की फसल कितने दिनों में पककर तैयार हो जाती है?

Ans: उन्नत और हाइब्रिड किस्मों के आधार पर बाजरे की फसल 65 से 90 दिनों में पूरी तरह पककर तैयार हो जाती है।

Q3. बाजरे की बुवाई का सबसे सही समय कौन सा है?

Ans: खरीफ फसल के लिए जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई का मध्य सबसे उपयुक्त समय माना जाता है।

Q4. क्या बाजरे की खेती कम बारिश वाले क्षेत्रों में संभव है?

Ans: हां, बाजरा एक सूखा सहनशील फसल है और 40-50 सेमी कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी अच्छी पैदावार देती है।

Q5. बाजरे में सिट्टे आते समय कौन सी बात ध्यान रखनी चाहिए?

Ans: सिट्टे बनते समय और दानों में दूध भरते समय खेत में नमी होना अति आवश्यक है, अन्यथा दाना हल्का रह जाता है।

Q6. बाजरे की फसल में खरपतवार नियंत्रण कैसे करें?

Ans: बुवाई के 15-20 दिन बाद पहली निराई-गुड़ाई करें या बुवाई के तुरंत बाद एट्राजिन (Atrazine) का स्प्रे करें।

Q7. बाजरे के चारे के क्या फायदे हैं?

Ans: बाजरे का सूखा व हरा चारा मवेशियों के लिए पौष्टिक और सुपाच्य होता है, जिससे दुधारू पशुओं के दूध में वृद्धि होती है।

Q8. बाजरे का अरगट (Ergot) रोग क्या है?

Ans: यह फफूंद जनित रोग है जिसमें सिट्टों से चिपचिपा रस निकलता है। इससे बचाव के लिए नमक के पानी से बीजोपचार करना चाहिए।

Q9. बाजरे की रोपाई (Transplanting) विधि कब अपनाई जाती है?

Ans: जब मानसून देर से आए या खेत समय पर खाली न हो, तो 15-20 दिन की पौध तैयार कर खेत में रोपाई की जाती है।

Q10. बाजरे की एक एकड़ से कितनी पैदावार मिल जाती है?

Ans: उन्नत हाइब्रिड बीजों और सही प्रबंधन से प्रति एकड़ 12 से 18 क्विंटल दाना और भारी मात्रा में चारा प्राप्त होता है।