प्याज की खेती करने का सही तरीका के बारे में बात करेंगे
प्याज की खेती में प्याज एक महत्वपूर्ण सब्जी एवं मसाला फसल है इसमें प्रोटीन एवं कुछ बिटामिन भी अल्प मात्रा में रहते है प्याज में बहुत से औसधीय गुण पाये जाते है। प्याज का सूप, अचार एवं सलाद के रूप में उपयोग किया जाता है।भारत के प्याज उत्पादक राज्यो में महाराष्ट्र, गुजरात, उ.प्र., उड़ीसा, कर्नाटक, तमिलनाडू, म.प्र., आन्ध्रप्रदेश एवं बिहार प्रमुख हैं। मध्य प्रदेश भारत का सबसे बड़ा प्याज उत्पादक प्रदेश है। म.प्र. में प्याज की खेती खंण्डवा, शाजापुर, रतलाम छिंन्दवाडा सागर एवं इन्दौर में मुख्य रूप से की जाती हैसामान्य रूप में सभी जिलो में प्याज की खेती की जाती है।भारत से प्याज का निर्यातमलेसिया, यू.ए.ई. कनाड़ा , जापान, लेबनान एवं कुबेत में निर्यात किया जाता है।
जलवायु
यद्यपि प्याज ठण्डे मौसम की फसल हैं, लेकिन इसे खरीफ में भी उगाया जा सकता हैं। कंद निर्माण के पूर्व प्याज की फसल के लिए लगभग 210से. ग्रे. तापक्रम उपयुक्त माना जाता है। जबकि शल्क कंदों में विकास के लिए 150 से. ग्रे. से 250 से. ग्रे. का तापक्रम उत्तम रहता हैं।
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मृदा:
प्याज की खेती विभिन्न प्रकार की मृदाओं में की जा सकती है,प्याज की खेती के लिए उचित जलनिकास एवं जीवांषयुक्त उपजाऊ दोमट तथा वलूई दोमट भूमिजिसका पी.एच. मान 6.5-7.5 के मध्य हो सर्वोत्तम होती है, प्याज को अधिक क्षारीय या दलदली मृदाओं में नही उगाना चाहिए।
उन्नत किस्में:
1. एग्री फाउण्ड डार्क रेड:
यह किस्म भारत में सभी क्षैत्रों में उगाने के लिए उपयुक्त है। इसके शल्क कन्द गोलाकार, 4-6 सेमी. आकार वाले, परिपक्वता अवधि 95-110, औसत उपज 300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर । यह किस्म खरीफ प्याज(वर्षात की प्याज ) उगाने के लिए अनुसंशित है।
2. एन – 53
भारत के सभी क्षेत्रों में उगाया जा सकता है, इसकी परिपक्वता अवधि 140 दिन, औसत उपज 250-300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, इसे खरीफ प्याज (वर्षातकी प्याज) उगाने हेतु अनुसंशित किस्म हैं।
3. भीमा सुपर:
यह किस्म भी खरीफ एवं पिछेती खरीफ के लिये उपयुक्त है। यह किस्म 110-115 दिन में तैयार हो जाती है तथा प्रति हेक्टेयर 250-300 किवंटल तक उपज देती है।
भूमि की तैयारी:
प्याज के सफल उत्पादन में भूमि की तैयारी का विशेष महत्व हैं। खेत की प्रथम जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करना चाहिए। इसके उपरान्त 2 से 3 जुताई कल्टीवेटर या हैरा से करें, प्रत्येक जुताई के पश्चात् पाटा अवश्य लगाऐं जिससे नमी सुरक्षित रहें तथा साथ ही मिट्टी भुर-भुरी हो जाऐ। भूमि को सतह से 15 से.मी. उंचाई पर 1.2 मीटर चैड़ी पट्टी पर रोपाई की जाती है अतः खेत को रेज्ड-बेड सिस्टम से तैयार किया जाना चाहिए।
खाद एवं उर्वरक:
प्याज की फसल को अधिक मात्रा में पोषक तत्वो की आवश्यकता होती है प्याज की फसल में खाद एवं उर्वरक का प्रयोग मृदा परीक्षण के आधार पर ही करना चाहिए। गोबर की सड़ी खाद 20-25 टन/हेक्टेयर रोपाई से एक-दो माह पूर्व खेत में डालना चाहिए। इसके अतिरिक्त नत्रजन 100 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर, स्फुर 50 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर तथा पोटाश 50 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर देने की अनुसंशा की जाती हैं। इसके अतिरिक्त सल्फर 25 कि.ग्रा.एवं जिंक 5 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर प्याज की गुणवत्ता सुधारने के लिए आवश्यक होते हैं
पौध तैयार करना:
पौध शाला के लिए चुनी हुई जगह की पहले जुताई करें इसके पश्चात् उसमें पर्याप्त मात्रा में गोबर की सड़ी खाद या कम्पोस्ट डालना चाहिए। पौधशाला का आकार 3 मीटर ग 0.75 मीटर रखा जाता हैं और दो क्यारियों के बीच 60-70 सेमी. की दूरी रखी जाती हैं जिससे कृषि कार्य आसानी से किये जा सके। पौधशाला के लिए रेतीली दोमट भूमि उपयुक्त रहती हैं, पौध शैय्या लगभग 15 सेमी. जमीन से ऊँचाई पर बनाना चाहिए बुवाई के बाद शैय्या में बीजों को 2-3 सेमी. मोटी सतह जिसमें छनी हुई महीन मृदा एवं सड़ी गोबर की खाद या कम्पोस्ट खाद से ढंक देना चाहिए। बुवाई से पूर्व शैय्या को 250 गेज पालीथीन द्वारा सौर्यकरण उपचारित कर ले।
बीजों को हमेशा पंक्तियों में बोना चाहिए। खरीफ मौसम की फसल के लिए 5-7 सेमी. लाइन से लाइन की दूरी रखते हैं। इसके पश्चात् क्यारियों पर कम्पोस्ट, सूखी घास की पलवार(मल्चिंग) बिछा देते हैं जिससे भूमि में नमी संरक्षण हो सकें। पौधशाला में अंकुरण हो जाने के बाद पलवार हटा देना चाहिए। इस बात का ध्यान रखा जाये कि पौधशाला की सिंचाई पहले फब्बारें से करना चाहिए। पौधों को अधिक वर्षा से बचाने के लिए पौधशाला या रोपणी को पॉलिटेनल में उगाना उपयुक्त होगा।
बीज की मात्रा:
१५ से २० किलोग्राम/हेक्टेयर
पौधशाला शैय्या पर बीज की बुवाई एवं रोपाई का समय:
खरीफ मौसम हेतु पौधशाला शैय्या पर बीजों की पंक्तियों में बुवाई 1-15 जून तक कर देना चाहिए, जब पौध 45 दिन की हो जाऐ तो उसकी रोपाई कर देना उत्तम माना जाता हैं। पौध की रोपाई कूड़ शैय्या पद्धिति से तैयार खेतों पर करना चाहिए, इसमें 1.2 मीटर चैड़ी शैय्या एवं लगभग 30 से.मी. चैड़ी नाली तैयार की जाती हैं।
खरपतवार नियंत्रण:
फसल को खरपतवारों से मुक्त रखने के लिए कुल ! 3 से 4 निराई-गुडाई की आवश्यकता होती है। प्याज के पौधे एक-दूसरे के !नजदीक लगाये जाते है तथा इनकी जडे !भी उथली रहती है अतः खरपतवार नष्ट करने के लिए रासायनिक! पदार्थो का उपयोग किया जाना उचित होता है। इसके !लिए पैन्डीमैथेलिन 2.5 से 3.5 लीटर/हेक्टेयर अथवा !आॅक्सीफ्लोरोफेन 600-1000 मिली/हेक्टेयर खरपतवार !नाशक पौध की रोपाई के 3 दिन पश्चात 750 !लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना बहुत प्रभावी और उपयुक्त पाये गये हैं।
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सिंचाई एवं जलनिकास:
खरीफ मौसम की फसल में रोपण के! तुरन्त बाद सिंचाई करना चाहिए अन्यथा सिंचाई में देरी से पौधे! मरने की संभावना बढ़ जाती हैं। खरीफ मौसम में उगाई जाने !वाली प्याज की फसल को जब मानसून चला जाता हैं! उस समय सिंचाईयाँ आवश्यकतानुसार करना चाहिए। इस बात का ध्यान रखा जाऐ !कि शल्ककन्द निर्माण के समय पानी की! कमी नहीं होना चाहिए क्योंकि यह प्याज फसल !की क्रान्तिक अवस्था होती हैं क्योंकि इस! अवस्था में पानी की कमी के कारण उपज में! भारी कमी हो जाती हैं, जबकि अधिक मात्रा !में पानी बैंगनी धब्बा(पर्पिल ब्लाच) रोग को! आमंत्रित करता हैं।
काफी लम्बे समय तक खेत को सूखा !नहीं रखना चाहिए अन्यथा शल्ककंद फट जाऐगंे एवं फसल जल्दी !आ जाऐगी, परिणामस्वरूप उत्पादन कम प्राप्त !होगा। अतः आवश्यकतानुसार 8-10 दिन के अंतराल से हल्की! सिंचाई करना चाहिए। यदि अधिक वर्षा या !अन्य कारण से खेत में पानी रूक जाऐ तो !उसे शीघ्र निकालने की व्यवस्था करना चाहिए! अन्यथा फसल में फफूंदी जनित रोेग लगने ! की संभावना बढ़ जाती हैं।
कंदों की खुदाई:
खरीफ प्याज की फसल लगभग 5 माह में नवम्बर-दिसम्बर माह में खुदाई के लिए तैयार हो जाती है। जैसे ही प्याज की गाँठ अपना पूरा आकर ले लेती है और पत्तियां सूखने लगे तो लगभग 10-15 दिन पूर्व सिंचाई बंद कर देना चाहिए और प्याज के पौधों के शीर्ष को पैर की मदद से कुचल देना चाहिए। इससे कंद ठोस हो जाते हैं और उनकी वृद्धि रूक जाती है। इसके बाद कंदों को खोदकर खेत में ही कतारों में ही रखकर सुखाते है।
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फसल सुरक्षा:-
1. थ्रिप्स:
ये कीट पत्तियों का रस चूसते हैं जिसके कारण पत्तियों पर चमकीली चांदी जैसी धारियां या भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं। ये बहुत छोटे पीले या सफेद रंग के कीट होते हैं जो मुख्य रूप से पत्तियों के आधार या पत्तियों के मध्य में घूमते हैं।
इसके नियंत्रण हेतु नीम तेल आधारित कीटनाशियों का छिड़काव करें या इमीडाक्लोप्रि कीटनाशी 17.8 एस.एल. दवा की मात्रा 125 मिली./हे. 500-600 लीटर पानी मंे मिलाकर छिड़काव करें।
2. माइट:
इस कीट के प्रकोप के कारण पत्तियों पर धब्बों का निर्माण हो जाता हैं और पौधे बौने रह जाते हैं। इसके नियंत्रण हेतु 0.05ः डाइमेथोएट दवा का छिड़काव करें।
3. बैंगनी धब्बा (परपल ब्लाॅच):
यह एक फफूंदी जनित रोग हैं, इस रोग का प्रकोप दो परिस्थितियों में अधिक होता हैं पहला अधिक वर्षा के कारण दूसरा पौधों को अधिक समीप रोपने से पत्तियों पर बैंगनी रंग के धब्बे बन जाते हैं। परिणामस्वरूप पोधों की बढ़वार एवं विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हैं।
इसके लक्षण दिखाई देने पर मेनकोजेब (2.5 ग्रा./ली. पानी) का 10 दिन के अन्तराल से छिड़काव करें। इन फफूंदनाशी दवाओं में चिपकने वाले पदार्थ जैसे सैन्उो विट, ट्राइटोन या साधारण गोंद अवश्य मिला दें जिससे घोल पत्तियों पर प्रभावी नियंत्रण हेतु चिपक सकें।
उपज:
खरीफ प्याज की प्रति हेक्टेयर उपज 250-300 क्विंटल तक मिल जाती हैं।
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भारत में प्याज (Onion) एक ऐसी व्यावसायिक फसल है जो रसोई से लेकर भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। भोजन का स्वाद बढ़ाने के साथ-साथ यह किसानों के लिए बंपर मुनाफा कमाने वाली प्रमुख नगदी फसल (Cash Crop) है। महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में प्याज की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। यदि सही तकनीक, उन्नत किस्मों और वैज्ञानिक प्रबंधन का ध्यान रखा जाए, तो किसान कम लागत में प्याज की फसल से रिकॉर्ड तोड़ उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं।
प्याज की खेती में नर्सरी की तैयारी, पौध रोपाई, संतुलित खाद-उर्वरक प्रबंधन, सिंचाई और रोगों से सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण चरण होते हैं। इस लेख में हम आपको प्याज की खेती करने का सही तरीका (Onion Farming Guide) विस्तार से बता रहे हैं, ताकि आप अपनी उपज और गुणवत्ता दोनों में सुधार कर सकें। कृषि और बागवानी से जुड़ी अन्य उपयोगी जानकारियों के लिए हमारी Kheti Kisani Category को भी अवश्य पढ़ें।
1. उपयुक्त जलवायु और मिट्टी (Climate & Soil Requirements)
प्याज की खेती के लिए ठंडी और शुष्क जलवायु सबसे उत्तम मानी जाती है। इसके पौधों की शुरुआती वृद्धि के लिए 15°C से 25°C का तापमान और कंद (Bulb) बनने व पकने के समय 25°C से 35°C का तापमान आदर्श होता है। अत्यधिक आर्द्रता या लगातार बारिश फसल में फफूंद जनित रोगों का खतरा बढ़ा देती है।
मिट्टी का चयन: प्याज की अच्छी पैदावार के लिए जीवांश (ऑर्गेनिक मैटर) से भरपूर रेतीली दोमट या चिकनी दोमट मिट्टी सबसे अच्छी होती है। मिट्टी में जल निकासी (Drainage) की उत्तम व्यवस्था होनी चाहिए। भूमि का pH मान 6.0 से 7.5 के बीच होना चाहिए। भारी क्ले मिट्टी में कंदों का विकास रुक जाता है, इसलिए ऐसी जमीन से बचना चाहिए।
2. खेत की तैयारी और खाद प्रबंधन (Field Preparation & Fertility)
प्याज के कंद मिट्टी के अंदर विकसित होते हैं, इसलिए खेत की मिट्टी का भुरभुरा और समतल होना अति आवश्यक है:
- जुताई: सबसे पहले मिट्टी पलटने वाले हल से एक गहरी जुताई करें। इसके बाद 2 से 3 बार कल्टीवेटर या हैरो चलाकर पाटा (Plank) लगाएं ताकि मिट्टी समतल और भुरभुरी हो जाए।
- जैविक खाद: अंतिम जुताई के समय 8 से 10 टन प्रति एकड़ अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद मिट्टी में मिलाएं। कंपोस्ट खाद तैयार करने की सही विधि जानने के लिए पढ़ें Desi Khad Kaise Banaye.
- रासायनिक उर्वरक: प्रति एकड़ लगभग 40 किग्रा नाइट्रोजन, 25 किग्रा फास्फोरस, 30 किग्रा पोटाश और 10-15 किग्रा सल्फर देना चाहिए। सल्फर देने से प्याज में तीखापन और चमक बढ़ती है।
यदि आप रसायन-मुक्त और प्राकृतिक तरीके से सब्जियों की खेती करना चाहते हैं, तो देखें Pesticide Free Vegetable Farming Guide.
3. प्याज की उन्नत किस्में (Top Onion Varieties)
मौसम और क्षेत्र के अनुसार सही किस्म का चुनाव करना उत्पादन की दृष्टि से अत्यंत आवश्यक है:
- खरीफ सीजन किस्में: एन-53 (N-53), एग्रीफाउंड डार्क रेड (Agrifound Dark Red), और भीमा राज।
- रबी सीजन किस्में: पूसा रेड (Pusa Red), पूसा रत्नाकर, भीमा किरण, और एग्रीफाउंड लाइट रेड।
- सफेद प्याज किस्में: पूसा वाइट राउंड और भीमा श्वेता (प्रोसेसिंग और निर्यात के लिए उपयुक्त)।
घर में कम जगह पर लहसुन जैसी कंद वर्गीय फसलें उगाने की विधि जानने के लिए पढ़ें Ghar Me Lahsun Ki Kheti Kaise Kare. अन्य नकदी फसलों की वैज्ञानिक खेती के लिए Tamatar Ki Kheti Karne Ka Sahi Tarika देखें।
4. नर्सरी तैयार करना और बीजोपचार (Nursery Preparation)
प्याज की सीधी बुवाई के बजाय पहले नर्सरी में पौध तैयार की जाती है। एक एकड़ खेत में रोपाई के लिए 3 से 4 किग्रा बीज की आवश्यकता होती है।
- क्यारी निर्माण: जमीन से 10-15 सेमी ऊंची उठी हुई क्यारियां (Raised Beds) बनाएं ताकि अतिरिक्त पानी आसानी से निकल सके।
- बीजोपचार: बीजों को फफूंद जनित रोगों से बचाने के लिए थाइरम (Thiram) या ट्राइकोडर्मा (Trichoderma) 3 ग्राम प्रति किग्रा बीज की दर से उपचारित करें।
- पौध तैयार होना: लगभग 6 से 7 सप्ताह (40-45 दिन) में पौधे रोपाई के लिए तैयार हो जाते हैं जब उनकी लंबाई 12-15 सेमी हो जाए।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की तकनीकी सिफारिशों और शोध के लिए Indian Council of Agricultural Research (ICAR) की आधिकारिक साइट देखें।
5. पौध रोपाई की सही विधि (Transplanting Method)
नर्सरी से उखाड़े गए पौधों की रोपाई करते समय जड़ों को हल्का सा छांट लें और फफूंदनाशी घोल में डुबोकर ही लगाएं।
- दूरी (Spacing): कतार से कतार की दूरी 15 सेमी और पौधे से पौधे की दूरी 10 सेमी रखें।
- गहराई: पौधों को 2 से 3 सेमी से अधिक गहरा न गाड़ें, अन्यथा कंद का विकास सही आकार में नहीं हो पाता।
- रोपाई का समय: रोपाई हमेशा दोपहर बाद या शाम के समय करें और रोपाई के तुरंत बाद हल्की सिंचाई करें।
यदि आप बड़े पैमाने पर व्यावसायिक कृषि या अनुबंध पर काम कर रहे हैं, तो देखें Contract Farming Kya Hota Hai.
6. सिंचाई और खरपतवार नियंत्रण (Irrigation & Weed Management)
प्याज की जड़ें उथली होती हैं, इसलिए इसे हल्की और नियमित सिंचाई की आवश्यकता होती है।
- सिंचाई: रोपाई के तुरंत बाद पहली सिंचाई करें। इसके बाद मौसम के अनुसार 8 से 10 दिन के अंतराल पर पानी दें। कंद बनते समय खेत में नमी की कमी नहीं होनी चाहिए।
- ड्रिप सिंचाई (Drip Irrigation): ड्रिप या स्प्रिंकलर पद्धति अपनाने से पानी और उर्वरक दोनों की बचत होती है और पैदावार 20-30% बढ़ जाती है।
- निराई-गुड़ाई: रोपाई के 20-25 दिन और 45 दिन बाद हल्की निराई-गुड़ाई करें। खरपतवार नियंत्रण के लिए पेन्डीमेथालिन (Pendimethalin) का प्रयोग रोपाई के 3 दिन के भीतर किया जा सकता है।
7. कीट एवं रोग नियंत्रण (Pest & Disease Control)
प्याज की फसल को मुख्य रूप से निम्नलिखित कीट और बीमारियां नुकसान पहुंचाते हैं:
- थ्रिप्स या चुरड़ा (Thrips): ये छोटे कीड़े पत्तियों का रस चूसते हैं जिससे पत्तियां चांदी जैसी सफेद पड़ जाती हैं। इसके नियंत्रण के लिए इमिडाक्लोप्रिड (Imidacloprid) या नीम तेल का छिड़काव करें।
- बैंगनी धब्बा रोग (Purple Blotch): पत्तियों पर बैंगनी रंग के धब्बे बनते हैं। बचाव के लिए मैनकोजेब (Mancozeb) का छिड़काव करें।
- कंद सड़न (Bulb Rot): खेत में जलभराव न होने दें और कॉपर ऑक्सीक्लोराइड का प्रयोग करें।
बागवानी और कृषि योजनाओं की आधिकारिक जानकारी हेतु National Horticulture Board (NHB) पोर्टल पर जाएं।
8. कटाई, सुखाना और भंडारण (Harvesting & Storage)
जब प्याज की 50-60% पत्तियों का ऊपरी हिस्सा सूखकर अपने आप नीचे गिरने लगे (Neck Fall), तो समझे कि फसल कटाई के लिए तैयार है।
- कटाई: कंदों को सावधानीपूर्वक उखाड़ें ताकि वे कटे-फटे नहीं।
- सुखाना (Curing): कटाई के बाद प्याज को 3 से 4 दिनों तक खेत में ही पत्तियों से ढककर सुखाएं, फिर 2-3 सेमी पत्ती छोड़कर काट लें। इसके बाद हवादार छायादार स्थान पर 10-15 दिन सुखाएं।
- भंडारण: प्याज का भंडारण ठंडे, हवादार और नमी-रहित गोदाम में करें। अनाज और फसल भंडारण की सही विधि जानने के लिए पढ़ें Anaj Bhandaran Karne Ka Sahi Tarika.
कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के आधिकारिक पोर्टल के लिए Ministry of Agriculture & Farmers Welfare विजिट करें।
9. अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (10 FAQs)
1. एक एकड़ में प्याज का कितना बीज लगता है?
एक एकड़ खेत की रोपाई हेतु नर्सरी तैयार करने के लिए लगभग 3 से 4 किलोग्राम प्याज के बीज की आवश्यकता होती है।
2. प्याज की पौध कितने दिनों में रोपाई योग्य हो जाती है?
नर्सरी में बीज बोने के लगभग 40 से 45 दिन (6-7 सप्ताह) बाद पौधे खेत में रोपाई के लिए तैयार हो जाते हैं।
3. प्याज की फसल कितने दिनों में तैयार हो जाती है?
उन्नत किस्म और मौसम के आधार पर प्याज की फसल पौध रोपाई के 100 से 140 दिनों में पूरी तरह पककर तैयार हो जाती है।
4. प्याज में सल्फर (Sulfur) का उपयोग क्यों जरूरी है?
सल्फर देने से प्याज की गुणवत्ता, कंदों का आकार, कड़ापन, विशेष गंध/तीखापन और भंडारण क्षमता (Shelf Life) काफी बढ़ जाती है।
5. क्या प्याज की सीधी बुवाई की जा सकती है?
हां, सीधी बुवाई की जा सकती है, लेकिन नर्सरी तैयार करके पौध रोपाई (Transplanting) करने से कंदों का आकार समान और उत्पादन अधिक प्राप्त होता है।
6. प्याज की कटाई का सही समय कैसे पहचानें?
जब खेत में 50% से अधिक पौधों की गर्दन (पत्तियां) मुड़कर जमीन पर गिरने लगें और सूखी दिखें, तो यह कटाई का सही समय होता है।
7. प्याज के कंद छोटे रहने का क्या कारण है?
सघन रोपाई (पौधों के बीच कम दूरी), नाइट्रोजन की अधिकता, सल्फर की कमी, या रोपाई के समय पौधे बहुत गहरे गाड़ने से कंद छोटे रह जाते हैं।
8. प्याज को सड़ने से बचाने के लिए क्या करें?
कटाई के बाद प्याज को धूप और छाया में अच्छी तरह सुखाएं (Curing), तथा भंडार गृह में नमी और हवा के आवागमन का सही ध्यान रखें।
9. क्या खरीफ (बरसात) के मौसम में प्याज की खेती संभव है?
हां, एन-53 और एग्रीफाउंड डार्क रेड जैसी विशेष किस्मों का चयन करके खरीफ (बरसात) सीजन में भी सफलता पूर्वक प्याज उगाई जा सकती है।
10. एक एकड़ से प्याज की कितनी पैदावार मिल सकती है?
उन्नत तकनीकों, सही किस्म और उचित प्रबंधन से प्रति एकड़ 100 से 150 क्विंटल तक प्याज की पैदावार प्राप्त की जा सकती है।